• मंगलवार, सितम्बर  17, 2019
:: उच्चतर शिक्षा विभाग, मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा शिक्षक और शिक्षण पर पंडित मदन मोहन मालवीय राष्ट्रीय मिशन की योजना के अंतर्गत शिक्षक शिक्षण केन्द्र के लिए विद्यापीठ के शिक्षाशास्त्र विभाग को स्वीकृति प्रदान की है |
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वेद-वेदाङ्ग सङ्काय

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वास्तुशास्त्र विभाग
Staff Details

भारतीय चिन्तन धारा के आदि स्रोत के रूप में वेद ही सभी शास्त्रों के मूल आधार हैं । यह सर्वविदित है कि चार वेदों के चार उपवेद भी विख्यात हैं । यथा ऋग्वेद का आयुर्वेद, यजुर्वेद का धनुर्वेद ,सामवेद का गान्धर्व वेद, अथर्ववेद का स्थापत्य वेद । स्थापत्य वेद का अभिप्राय भी निवास योग्य स्थापना से ही है । ऋग्वेद के एक वर्णन में वास्तोष्पति से प्रार्थना करते हुए कहा गया है कि हे वास्तोष्पते तुम हमको समझो । हमारे घर को नीरोग करने वाले हो ओ । जो धन हम तुम्हारे पास से मांगे तुम हमको दे दो । हमारे द्विपद चतुष्पदों के लिए कल्याणकारी हो ओ । यथा -


वास्तोष्पते प्रति जानीह्यस्मान्त्स्वावेशो अनमीवो भवा नः ।
यत् त्वेमहे प्रति तन्नो जुषस्व शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे ।। ( ऋग्वेद 7.54.1)


ज्योतिष शास्त्र के संहिता भाग में सर्वाधिक रूप से वास्तुविद्या का वर्णन उपलब्ध होता है । ज्योतिष के विचारणीय पक्ष दिक्-देश-काल के कारण ही वास्तु ज्योतिष के संहिता भाग में समाहित हुआ । वेदिक काल से ही ज्योतिष शास्त्र अति पुरातन परम्परा से मानव जीवन के विविध पक्षों का सूक्ष्मातिसूक्ष्म विचार करता आ रहा है ।


सहस्त्रों वर्षों से हमारे आचार्यों ने इस क्षेत्र में अनेकों परिवर्तन एवं परिवर्धन किये । मत्स्य पुराण के अनुसार भृगु, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वकर्मा, मय, नारद, नग्नजित, विशालाक्ष, पुरन्दर, नन्दीश, शौनक, गर्ग, वासुदेव, अनिरुद्ध, शुक्र, बृहस्पति एवं अश्विनीकुमारों ने वास्तु की विस्तृत व्याख्या करके अच्छे कीर्तीमान स्थापित किये हैं । अश्विनीकुमार, विश्वकर्मा, मय सर्वाधिक रूप से वास्तु के विख्यात आचार्य रहे हैं । विश्वकर्मा व मय प्रायः वास्तुशास्त्र के समकालीन प्रतिद्वन्दी जाने जाते हैं । आज दानव शिल्पी मय का मयमतम् तथा देव शिल्पी विश्वकर्मा का विश्वकर्मा प्रकाश नाम के ग्रन्थ उपलब्ध हैं । उत्तरोत्तर वास्तुशास्त्र पर अनेकों स्वतन्त्र ग्रन्थ प्रकाशित हुए । इन सभी ग्रन्थों में हर तरह के वास्तु की चर्चा ही नहीं अपितु वास्तु के उद्देश्यों एवं आवश्यकता पर विशेष रूप से प्रकाश डाला गया ।


स्थापत्य वेद ही उत्तरवर्ती काल में वास्तुशास्त्र के रूप में परिणत हुआ । वैदिक काल में गृहों का निर्माण ही वास्तु माना जाता था । बाद में गृहों के विकास के साथ ही ग्रामों , नगरों एवं महानगरों का विकास होने लगा । ये सभी विकास वास्तु के अन्तर्गत ही हुए , जिसके चलते वास्तु के क्षेत्र में पर्याप्त विकास हुआ । शनैः शनैः मूर्तिकला एवं चित्रकला भी इसके अंग बन गये । भवन विन्यास को स्थापत्य , मूर्ति निर्माण को शिल्प तथा चित्र निर्माण को आलेख कहा जाने लगा । वास्तु में ही भित्ति प्रतिमाओं तथा भित्ति चित्रों को स्वीकार कर लिया गया । यही कारण रहा है की भोजराज ने समराङ्गण सूत्रधार में वास्तुशास्त्र को तीन भागों में विभक्त माना । 1. स्थापत्य 2. शिल्प 3. चित्र । वास्तुशास्त्र में देवभवन विन्यास , राजभवन विन्यास एवं जनभवन विन्यास को स्थापत्य के , प्रतिमा आदि धातु , काष्ठ , एवं पाषाण निर्माण को शिल्प के तथा समग्र भित्ति चित्रों एवं रेखाचित्रों को आलेख के अन्दर समाहित किया गया । कुछ विद्वानों का मानना है कि वास्तुशास्त्र - शिल्पशास्त्र के अन्तर्गत है परन्तु समराङ्गण सूत्रधार ने शिल्प और चित्र को वास्तुशास्त्र में समाहित माना । सम्राङ्गणसूत्रधार से कई सौ वर्ष पूर्व वराहमिहिर ने उक्त सभी विषयों को ज्यौतिषशास्त्र के संहिता विभाग में वर्णित किया गया है । सम्प्रति प्राप्त संपूर्ण वास्तुशास्त्र के ग्रन्थों में पुर, दुर्ग, भवन, प्रासाद, प्रतिमा, चित्र, यन्त्र, शयनासन आदि समग्र स्थापत्य के अंगो का वर्णन एवं परम्परा का निर्वहन विस्तृत रूप में मिलता है ।


सृष्टि पञ्चभूतात्मक है , ठीक इसी प्रकार मनुष्य का शरीर भी पांच तत्वों ( पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश ) का ही समिश्रण है । पृथ्वी पर किया जाने वाला कोई भी कार्य पांच तत्वों पर ही आधारित होता है, पृथ्वी पर सूर्य की रश्मियों का प्रभाव ? पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र, हवाओं की दिशा व उसका प्रभाव आदि कुछ ऐसे तथ्य हैं जिनका वास्तुशास्त्र की दृष्टि से विचार आवश्यक है । प्रातः कालीन सूर्य रश्मियाँ स्वास्थ्य पर अनुकूल और मध्याह्न कालीन सूर्य रश्मियाँ स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं । चुम्बकीय क्षेत्र हमारे शरीर को सर्वाधिक प्रभावित करता है इसी लिए हमारे आचार्यों ने उत्तर दिशा की ओर शिर करके शयन करना निषिद्ध कहा है ।


वस्तुतः वास्तुपुरुष पृथ्वी की चुम्बकीय शक्ति और विभिन्न बलधाराओं का उठता स्वरूप है जिसे सन्तुलित करने के लिए ग्रहों , नक्षत्रों , सूर्य , चन्द्र , वायु , जल , तप आदि प्राकृतिक शक्तियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई परन्तु यह चेतना का स्वरूप है जो बुद्धि से नहीं भावना से देखा जाता है । पृथ्वी सतह की चेतना को हमारे पूर्वजों ने चैतन्य वास्तुपुरुष के रूप में देखा , समझा , पूजा और तदनुकूल भवन , नगर आदि रचनायें की । आज तो भौतिकविद् इस विश्व को अविलगित ऊर्जा प्रतिकृतियों का गतिशील जाल (Dynamic web of inseparable energy patterns )मानते हैं । इस समग्र पृथ्वी पर वास्तुपुरुष का एक रूप और प्रत्येक व्यष्टि रूप वास्तु में वास्तुपुरुष का एक अन्य रूप , इस प्रकार के बृहद् से बृहद् सूक्ष्म से सूक्ष्म वास्तु रूपों के वर्णन से यह द्योतित होता है कि जैसे हमारा सम्पूर्ण शरीर एक सजीव इकाई है परन्तु उसे बनाने वाली सूक्ष्म कोशिकायें भी अपने में एक चैतन्य इकाईयां हैं । उनकी प्रतिक्रियायें समग्र शरीर की प्रतिक्रिया होती है । यही एकात्मता का भाव वास्तु में भी प्रधान है । ग्रह , नक्षत्र , सूर्य , चन्द्र आदि सभी के ऊर्जा प्रभाव के कारण वास्तु रचना अनुकूल और प्रतिकूल परिणाम देती है इसीलिए वास्तु शास्त्र ने जीवन में इन सभी बलधाराओं और ऊर्जा प्रभावों को देवताओं के भिन्न - भिन्न नामों और रूपों से देखा , समझा और पूजा ।


वास्तु शास्त्र का उद्देश्य सर्वविध सुखी एवं शान्त सुरक्षित जीवन से है जहां रहकर व्यक्ति अपने उद्देश्य की पूर्ति कर सके । भौतिकवाद दृष्टिकोण से हम एक घर को सुन्दर आकार तो दे सकते हैं परन्तु उसमें व्यक्ति सुखी समृद्ध रहेगा इसकी निश्चित कल्पना नहीं की जा सकती है , जबकी हमारे आचार्यों ने सर्वविध विचार किया है । हम धरती ग्रह बनाते हैं पृथ्वी हमारी माता है । वह हमें धारण किये हुए है , वह हमारे सौर परिवार की एक सजीव इकाई है जिसमें चतुर्दिक् जीवन फल फूल रहा है । ऐसा ग्रह हमारे सौर मण्डल में एक ही है शायद और भी अधिक जीवित ग्रहों वाले सौर मण्डल होंगे जिनका वर्णन रूपान्तर से हमारे प्राचीन ग्रन्थों में मिलता है परन्तु यह समग्र विश्व ब्रह्माण्ड जिस महत् चेतना से व्याप्त है जो इसको संचालित , नियमित और नियन्त्रित करता है वही ईश्वर है । यह कालातीत ईश्वर नित्य, नूतन, पुरातन, स्थिर और परिवर्तनशील भी है । दृश्य और अदृश्य सबका भूत, भविष्य, वर्तमान भी वही है । यही वास्तुपुरुष के रूप में पूजा जाता है । आचार्यों ने मानव की सफलता एवं पुरुषार्थ चतुष्ट्य की सिद्धि के लिए ग्रह की परमावश्यकता को माना है । यथा -


गृहस्थस्य क्रियाः सर्वाः न सिद्धयन्ति गृहं विना ।
यतस्तस्माद् गृहारम्भकर्म यात्राभिधीयते ।।


अर्थात् गृहस्थ की सभी क्रियायें स्वगृह में ही सिद्ध होती है न कि परगृह में । अतः गृहारम्भ करना चाहिए । यथा -


परगेहे कृताः सर्वा श्रोतस्मार्तक्रियाः शुभाः ।
न सिद्धयन्ति यतस्तस्माद् भूमीशः फलमश्नुते ।।


अर्थात् दूसरे के घर में किये हुए श्रोत स्मार्तादि शुभ कर्मों का फल प्रायः निष्फल हो जाता है क्योंकि इस प्रकार के कार्यों का फल गृहपति ( घर के मालिक ) को जाता है ।


भारतीय संस्कृति के विकास में धर्म की महत्वपूर्ण भूमिका है । यहाँ धर्म को विराट अर्थ में लिया गया है । हमारे पूर्वजों ने धर्म की व्याख्यायें की । इसी सातत्य में उन्होने लिखा - यतोऽभ्युदयनिश्रेयस्सिद्धि स धर्मः । अर्थात जिससे मानव का अभ्युदय और उसका निःश्रेयस दोनों सिद्ध हो सके वही धर्म है । अभ्युदय का अर्थ सांसारिक उन्नति से है । आमोद - प्रमोद , भोजन - पान, निवास एवं परिधान, अलङ्करण एवं रहन सहन के साधन जितने ही प्रचुर हों, सुलभ हों उतने ही वे अभ्युदय के परिचायक माने गये हैं । जैसे जैसे मानव घर में रहने लगा, वह सभ्य एवं सुसंस्कृत माना जाने लगा, अन्यथा मानव को असभ्य एवं जंगली ही कहा जाता था । अस्तु, कहने का संकेत है कि भवन निवेश मानव सभ्यता एवं संस्कृति के निर्माण में एक प्रमुख साधन है । रहने के लिए झोपङी है या विशाल भवन, या गगनचुम्बी विमान, यह तो मानव के अभ्युदय का परिचायक है ।


भारतीय संस्कृति का मूलाधार देव तत्व है । यहाँ कोई भी कार्य बिना देवत्व के प्रारम्भ नहीं किया गया, कोई भी शास्त्र बिना देवत्व के पठनीय नहीं है । इसमें कोई भी कला बिना देवत्व के ग्राह्य नहीं है । जैसे - नृत्य कला में नटराज शिव, संगीत में नाद ब्रह्म, आलेख में जगन्नाथ के पट चित्र तथा वास्तु में वास्तु पुरुष ( वास्तु देवता ) । यह संस्कृति सर्वत्र देव भावना से बंधी हुई है । कह सकते है कि यही भारतीय स्थापत्य की विशेषता है । हमने कला और विज्ञान को अध्यात्म एवं दर्शन से अलग नहीं रखा । हमारी मान्यता के अनुसार कला का जन्म मनोरञ्जन से नहीं अपितु धर्म और दर्शन से हुआ है । जो विज्ञान और कला आध्यात्म से शून्य तथा दर्शन से अनुप्राणित नहीं है वह कला एवं विज्ञान शुष्क काष्ठ की भाँति दहन योग्य एवं त्याज्य है । कला एवं विज्ञान आसुरी संपदा है, उसे राक्षस नहीं बनने देना चाहिए इसलिए उसे भी देवत्व की भावना से सदैव अनुप्राणित रखाना चाहिए जिससे वह पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्यावा, सूर्य, चन्द्रादि के समान जन - मंगल एवं जन - रक्षण कर सके । शुष्क विज्ञान कभी भी भारतीय संस्कृति में ग्राह्य नहीं रहा ।


भारतीय वास्तु सूक्ष्म से सूक्ष्म भी है और महान से महान भी, गृह चिन्तन में अणोरणीयान् हैं तथा ब्रह्माण्ड के चिन्तन में महतोमहीयान् । अतः इस सन्दर्भ में मात्र गृह तक ही चिन्तन करना अभिशाप होगा । वास्तु भारतीय संस्कृति का बङा ओजस्वी अङ्ग है । यह वह अङ्ग है जहाँ पार्थिव - अपार्थिव दोनों का संगम होता है । इस सन्दर्भ का यह निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए कि इस देश में भौतिक पक्ष को गौण माना गया, ऐसा नहीं है, हमने तो सदैव आध्यात्म एवं भौतिक को संतुलित रखा । भौतिक की उद्दात गति का सदैव आध्यात्म से निरोध होना चाहिए तभी प्रक्रिया सनातन रह सकती है । अन्यथा भौतिकवादी भस्मासुर अपने जनक शिव को ही भक्षण करने का प्रयास करेगा ।


वास्तुशास्त्र की एक विस्तृत शास्त्रीय परम्परा एवं वर्तमान में इसके स्वरूप व लोगों में इस शास्त्र के प्रति रुचि को देखते हुए हमारे यशस्वी पूर्वकुलपति स्वर्गीय प्रो. वाचस्पति उपाध्याय जी ने जुलाई 2004 में पूर्व सकाय प्रमुख एवं ज्योतिष विभागाध्यक्ष स्वर्गीय प्रो. शुकदेव चतुर्वेदी जी के सहयोग से विश्वविद्यालय अनुदान द्वारा स्वीकृत इन्नोवेटिव प्रोग्राम के अन्तर्गत विद्यापीठ में इस विषय का पठन पाठन प्रारम्भ किया , जो सम्प्रति सफलता पूर्वक चल रहा है ।


इन्ही दोनों लोगों की योजना के अनुरूप विद्यापीठ ने नियमानुसार वास्तुशास्त्र विभाग की स्थापना , विद्वत परिषद् की 19 वीं बैठक में मेमोरेण्डम ऑफ एसोसिएसन के नियम संख्या 20 ( ix - c ) के अनुसार वेद वेदाङ्ग संकाय के अन्तर्गत ज्योतिष का अन्तः विषयक ( इन्टरडिसीप्लीनरी ) रखते हुए पृथक वास्तुशास्त्र विभाग के रूप में स्वीकृति प्रदान की । विद्यापीठ के पत्रांक NO. LBSV/Admn/2013/865 दिनांक 15.7.2013 के अनुसार ज्योतिष विभाग के अन्तः सम्बन्धित विभाग के रूप में वास्तुशास्त्र विभाग प्रारम्भ हुआ है । अन्य विभागों के ही अनुरूप वास्तुशास्त्र विभाग में भी शास्त्री , आचार्य , विशिष्टाचार्य एवं विद्यावारिधि की कक्षाओं में प्रवेश सत्र 2013 -14 से प्रारम्भ हो चुका है । जन सामान्य की वास्तुशास्त्र में रुचि को देखते हुए एवं विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के दिशा निर्देशानुसार वास्तुशास्त्र में षाण्मासिक प्रमाण पत्रीय (डिप्लोमा) पाठ्यक्रम , एक वर्षीय डिप्लोमा पाठ्यक्रम तथा द्विवर्षीय वास्तुशास्त्र एडवांस डिप्लोमा पाठ्यक्रम व वास्तुशास्त्रीय पी.जी. डिप्लोमा पाठ्यक्रम ( द्विवर्षीय चार सत्रों में ) चलाये जा रहे हैं । इन पाठ्यक्रमों का मुख्य उद्देश्य वास्तुशास्त्र के दुर्लभ एवं गम्भीर शास्त्रीय ज्ञान से सामान्य जनता को परिचित कराना है ।


वास्तुशास्त्र विभाग पाठ्यक्रम

  1. षाण्मासिक ( 6 माह का ) वास्तुशास्त्र प्रमाण पत्रीय पाठ्यक्रम ।
  2. एक वर्षीय वास्तुशास्त्र डिप्लोमा पाठ्यक्रम ।
  3. द्विवर्षीय वास्तुशास्त्र एडवांस डिप्लोमा पाठ्यक्रम ।
  4. वास्तुशास्त्रीय पी.जी. डिप्लोमा पाठ्यक्रम - द्विवर्षीय चार सत्रों में

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें वास्तुशास्त्र विभाग - कक्ष संख्या 104 -105 स्वर्ण जयन्ती सदन ,
संपर्क सूत्र -9582267640 , 8882921840, 01146060615

नवागन्तुक छात्रों के लिये विशेष सूचना

वास्तुशास्त्र विषय को शास्त्रीय विषय के रूप में लेने पर आपको प्राप्त होने वाले लाभ -

  1. वास्तुशास्त्र पूर्णतया वैज्ञानिक शास्त्र है तथा रोजगार की अपार संभावनायें हैं इसमें कोई शंका नहीं है ।
  2. जैसा की समाज में आजकल वास्तुशास्त्र का प्रसार प्रचार अत्यधिक व्यापक रूप से हो रहा है, जिस कारण समाज को वास्तुशास्त्रीयों की अत्यन्त आवश्यकता है अतः वास्तुशास्त्र को शास्त्रीय विषय के रूप में लेने से आपके सपने शीघ्र ही साकार रूप लेंगे जिससे आप भी समाज में अपना अमूल्य योगदान दे सकते हैं ।
  3. यदि हम सकारात्मक रूप से सोचे तो आज हर कला में वास्तु है तथा ये सम्पूर्ण प्रकृति भी विधाता की अद्भुत कला ही है अतः हर प्राकृतिक वस्तु में वास्तु ही है तथा चित्रकला(चाहे वह कपङे पर हो या लकङी तथा पत्थर पर हो)मूर्तिकला,भवननिर्माण,मंदिरनिर्माण व्यावसायिकभवन निर्माण,सजावट-बुनावट आदि हर चीज में वास्तु ही है ।
  4. वास्तु और ज्योतिष एक सिक्के के दो पहलू हैं अतः वास्तुशास्त्र के साथ साथ ज्योतिषशास्त्र का भी अध्ययन करवाया जायेगा। इससे वास्तुशास्त्र का क्षेत्र और भी व्यापक हो गया क्योकि आप फिर वास्तुशास्त्री के साथ साथ ज्योतिर्विद भी आप बन जायेंगे ।
  5. आधुनिक शैली के वास्तुविदों(architects) के साथ मिलकर प्रशिक्षण भी दिया जायेगा तथा साथ ही वास्तुशास्त्र के जटिल एवं गूढ़ तथ्यों को न केवल राष्ट्रीयस्तर अपितु अन्तर्राष्ट्रीयस्तर पर उपस्थापन अथवा समझाने की क्षमता विकसित की जायेगी ।
  6. विभाग में सुसज्जित कम्प्युटर लेब है जहां 3D (त्रिविमीय) द्वारा भवननिर्माण आदि जितने भी नक्शे होंगे उनको बनाने का विशेष प्रशिक्षण देने के साथ साथ अंग्रेजी भाषा का ज्ञान भी करवाया जायेगा जिससे वास्तुशास्त्र के विद्यार्थियों को न केवल रोजगार प्राप्त होगा अपितु वे स्वयं रोजगार के अवसरों को उत्पन्न करेंगे।
  7. वे विद्यार्थी जो प्राचीन शास्त्रों से सम्बद्ध वैज्ञानिक व प्रायोगिक कार्य करना चाहते हैं उनके लिये विविध परामर्श शिविरों , प्रशिक्षण शिविरों के माध्यम से तथा प्रायोगिक क्रियाकलापों द्वारा विषय का ज्ञान करवाया जायेगा जिससे जन साधारण में वास्तु व ज्योतिष के प्रसार प्रचार की क्षमता प्राप्त करेगा जिससे जीविका हेतु अवसर प्राप्त होंगे ।
  8. इस विभाग में विभिन्न प्रकार के आयोजन - प्रयोजनों के द्वारा विद्यार्थियों के हितों का पूर्णतः ध्यान रखा जाता है ।
 
 
 
 
  2006 सर्वाधिकार सुरक्षित संस्कृत विद्यापीठ , नई दिल्ली , सम्मति  :वेबमास्टर डिस्क्लेमर         अच्छा प्रदर्शन : 800X600
कम्प्यूटर केन्द्र द्वारा अनुरक्षित-एस एल बी एस आर एस वी , नई दिल्ली, ११००१६