• शनिवार, जुलाई 20, 2019
:: उच्चतर शिक्षा विभाग, मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा शिक्षक और शिक्षण पर पंडित मदन मोहन मालवीय राष्ट्रीय मिशन की योजना के अंतर्गत शिक्षक शिक्षण केन्द्र के लिए विद्यापीठ के शिक्षाशास्त्र विभाग को स्वीकृति प्रदान की है |
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महामहोपाधयाय डा- मण्डन मिश्र
 
 
 
राष्ट्रीय स्तर पर संस्कृत की प्रतिष्ठा
 

महामना पं. मदन मोहन मालवीय जी द्वारा स्थापित संस्कृत के प्रतिनिधि संगठन अखिल भारतीय संस्कृत साहित्य सम्मेलन के डा. मण्डन मिश्र सन् 1956 ई. में मन्त्री तथा सन् 1959 ई. में महामन्त्री पद के लिए चयनित हुए। अखिल भारतीय संस्कृत सम्मेलन को उस समय संगठन तथा साधन सुविधाओं की दृष्टि से एक युवा नेता की आवश्यकता थी। डा. मिश्र ने उसमें नव जीवन का संचार किया और सभी प्रदेशों में उसकी शाखायें स्थापित की। इनके निर्देशन में विश्व संस्कृत शताब्दी योजना का प्रवर्तन हुआ, जिसका उद्घाटन भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद जी ने किया। इस सम्मेलन ने संस्कृत के विकास के क्षेत्र में आधार-शिला का कार्य किया और भारत की राजधानी दिल्ली में एक संस्कृत विद्यापीठ की स्थापना का महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया। डा. राजेन्द्र प्रसाद की प्रेरणा से सम्मेलन के तत्कालीन पदाधिकारी पंजाब के राज्यपाल श्री नरहरि विष्णु गाडगिल और भारत के गृह राज्यमंत्री श्री बलवन्त नागेश दातार तथा प्रसिद्ध उद्योगपति श्री शान्ति प्रसाद जैन आदि महानुभावों ने डा. मिश्र की सेवायें राजस्थान सरकार से मांगी और उन्होंने 1962 ई. में दिल्ली आकर संस्कृत विद्यापीठ की स्थापना की। उस समय दिल्ली प्रशासन में संस्कृत विद्यापीठ की स्थापना की। उस समय दिल्ली प्रशासन में संस्कृत की संस्थाओं की सहायता का कोई नियम नहीं था। अधिक से अधिक एक हजार रूपये वार्षिक की सहायता का कोई नियम नहीं था। अधिक से अधिक एक हजार रूपये वार्षिक की सहायता प्रत्येक संस्था को दी जाती थी। डा. मिश्र के प्रयासों से सभी संस्कृत विद्यालयों को प्रशासन द्वारा 85% (प्रतिशत) सहायता देने का निर्णय हुआ। इसके परिणाम स्वरूप अब प्रत्येक संस्था को लाखों रूपये की आर्थिक सहायता प्रशासन से मिलती है। डा. मिश्र सभी संस्थाओं को साथ लेकर चले। सौभाग्य से कुछ समय बाद प्रधानमंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री ने अखिल भारतीय संस्कृत साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता स्वीकार की और डा. मिश्र ने राजस्थान की 17 वर्षों की सेवा और राजस्थान में सामाजिक तथा सार्वजनिक जीवन में प्रतिष्ठा के आधार पर प्रत्यक्ष दृष्यमान सत्ता की निकटता के मोह को छोड़कर संस्कृत के लिए अपना जीवन अर्पित कर दिया। अचानक श्रीशास्त्री जी के निधन के बाद डा. मिश्र के प्रयासों से श्रीमती इन्दिरा गांन्धी ने डा. सम्पूर्णानन्द जी के अनुरोध पर सम्मेलन तथा विद्यापीठ का सभापतित्व स्वीकार कियाऔर 1967 ई. में श्री शास्त्रीजी का स्मृति में श्री लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रिय संस्कृत विद्यापीठ के रूप मे नाम परिवर्तित कर इसे भारत सरकार को संभला दिया। डा. मिश्र इसके संस्थापक निदेशक रहे। इनकी साधना से दिल्ली विद्यापीठ 1989 में मानित विश्वविद्यालय के रूप में समुन्नत हुआ। डा. मिश्र इसके प्रथम संस्थापक कुलपति नियुक्त किये गये। एक व्यक्ति के द्वारा रात्रि पाठशाला से प्रारम्भ कर जून, 1994 में इसके कुलपति पद से विश्राम ग्रहण करने के अनन्तर 1 जनवरी, 1996 से उत्तरप्रदेश शासन ने डा. मिश्र को सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के कुलपति पद पर नियुक्त किया। उनका तीन वर्ष से अधिक का कार्यकाल इस विश्वविद्यालय के इतिहास में सदा उल्लेखनीय रहेगा। समय पर परीक्षायें कराना, सत्र नियमित करना, 115 गं्रथों का प्रकाशन, सरस्वती मन्दिर की पूर्णता और उसकी प्राण प्रतिष्ठा राष्ट्रपति पं. शंकर दयाल शर्मा एवं श्री के.आर.नारायणन् के मुख्य आतिथित्व में दो दीक्षान्त समारोह किये दो-दो राष्ट्रपतियों का विश्वविद्यालय के इतिहास में एक अनुपम घटना है। एवं डा. मुरली मनोहर जोशी जी का पदार्पण विशेष उल्लेखनीय रहा। अपने स्वनामधन्य गुरू आचार्य पट्टाभिराम शास्त्री के स्मृति में आपने वाराणसी में श्री पट्टाभिराम शास्त्री वेद मीमांसा अनुसंधान केन्द्र की स्थापना की है जो वाराणसी में एक भव्य नवनिर्मित भवन में चल रहा है- आप इसके संस्थापक अध्यक्ष कांची शंकराचार्य द्वारा मनोनीत किये गये है।

 
 
 
 
  2006 सर्वाधिकार सुरक्षित संस्कृत विद्यापीठ , नई दिल्ली , सम्मति  :वेबमास्टर डिस्क्लेमर         अच्छा प्रदर्शन : 800X600
कम्प्यूटर केन्द्र द्वारा अनुरक्षित-एस एल बी एस आर एस वी , नई दिल्ली, ११००१६